| هر دمي عالمي خراب شدي | | گر دعا جمله مستجاب شدي |
| نشوي بر مراد خود پيروز | | تو دعا را اگر نداني روز |
| دست حاجت برون ميآر از جيب | | تا نيابد دل تو راه به غيب |
| وقت بين بيحضور نتوان شد | | غيبدان جز به نور نتوان شد |
| هر چه خواهي بخواه، دستوريست | | گر دلت حاضر و تنت نوريست |
| کز خدا جز خدا نجست و نخواست | | نفس مستجاب آنکس راست |
| تا نخواند کجا تواني شد؟ | | تو به خود نزد او نداني شد |
| حاضر او بس، که بيحضوري تو | | اوست نزديک ورنه دوري تو |
| با تو «اني قريب» کي گفتي؟ | | گر نه راه تقرب او رفتي |
| صورت خويش در نوردي تو | | چون در آن قرب محو گردي تو |
| از توسر ازل نهان نبود | | دگرت لذت از جهان نبود |
| برهي از مشقت غربت | | به محبت رسي از آن قربت |
| او ترا راه و راهبر گردد | | او ترا سمع و او بصر گردد |
| هر چه خواهي نباشد از تو دريغ | | او ترا دست گردد و او تيغ |
| سخنت جمله مستجاب شود | | نفس او با تو همخطاب شود |
| زان نظرهات فتح بابي هست | | غيب را با دلت خطابي هست |
| که نرفت آن خطاب در گوشت | | ليک هم آفتيست در هوشت |
| از کجا بر هدف درست آيد؟ | | تير چون از کمان سست آيد |
| سپري جز عطاي شاهت نيست | | تو که بازوي بيگناهت نيست |
| به دعاي تو کس رها نشود | | تا عصاي تو اژدها نشود |
| ميبري در دعاي باران خر | | چون نهاي واقف از دعاي بشر |
| پس برآور به سوي بالا دست | | پيش ايزد ببين قبولت هست؟ |
| همه تسبيح او همي گويند | | هر چه در خط عالم اويند |
| هست حدي که نگذرد زان بيش | | هر کسي را به قدر پايهي خويش |
| مگر از لهجهي کلامالله | | کس به تسبيح او نيابد راه |
| حق تسبيح او هم او داند | | هر زبان، گر چه گفتگو داند |
| نبري ره به سر منطق طير | | اندرين نکته چون نکردي سير |
| هر يکي را زبان حالي هست | | هر کرا از درش سالي هست |
| وان بيچاره؟ « انه کافي » | | ورد رنجور چيست؟ «يا شافي» |
| يا ز پيکان و سنگ و چنگل باز | | مرغ يا ز آب و دانه گويد راز |
| طلب ارزن و جو و گندم | | مور از آسيب سيل و آفت سم |
| کس نپيچد سر از اشارت تو | | گر ازين در بود عبارت تو |
| و آن بود کوت بر زبان راند | | در جهان اسم اعظم او داند |
| حاجتش سربسر روا گرديد | | هر که با نامش آشنا گرديد |
| نشود هيچ مستجاب سال | | تا نگويي سخن مناسب حال |
| تا بدان در دهند بازت راه | | هر چه خواهي به قدر حاجت خواه |
| هم نکوتر، کزان زيان تو نيست | | چو فزونت دهند ز آن تو نيست |
| پر تمنا کني، نه کم خواهي | | تو که زر داري و درم خواهي |
| تا بچار دگر هوس نکني | | دو بسازي سراي و بس نکني |
| ور فزونت دهد نگردي سير | | گر بلندت کند نيايي زير |
| بهلد تا همي درايي تو | | چون به حاجت چنين سرايي تو |
| در بزرگي و خردي ارچه شکيست | | حال آن طفل و حالت تو يکيست |
| ور چه شيرين کني دگر خواهد | | کانگبينش دهي شکر خواهد |
| بر دهانش زني شود خاموش | | چون ز حد بگذرد فغان و خروش |
| چون ز دانندهاي نياموزي | | اين حسابت کجا شود روزي؟ |
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